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रँग
रँग चढें हैं सभी पर
फिर भी बेरँग जीवन है
कितना पानी बरसा है
फिर भी प्यासा सावन है

रँग बिरँगे होने से
फर्क नही पड़ता कोई
सब के ही मन मैले हैं
प्यार नही करता कोई

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