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shayri
शाम की जानिब रवां है ये दिनों का कारवां
रात हर एक ऐसे गुज़री यूँ बयान ए कहकशां
क्यूं पशेमानी की चादर तन्हा हम धोते रहें
एक शब की बात है फिर तुम कहां और हम कहां

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